बंगाल की सत्ता में बदलाव तो आया, लेकिन सामाजिक समीकरण नहीं बदले! भाजपा भी नहीं तोड़ पाई ‘भद्रलोक राजनीति’ का दायरा

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बंगाल :- पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला। लंबे समय तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए भाजपा ने राज्य की राजनीति में नया इतिहास रच दिया। भाजपा समर्थक इसे “परिवर्तन का जनादेश” बता रहे हैं, लेकिन इस बदलाव के बीच अब एक नई बहस तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बंगाल में सिर्फ सरकार बदली है, या फिर सत्ता का सामाजिक ढांचा भी बदला है?

भाजपा की जीत के बाद अब शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व उन्हें बंगाल का नया चेहरा बना सकता है। लेकिन इसी के साथ विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या भाजपा भी बंगाल की पारंपरिक “भद्रलोक राजनीति” के दायरे को नहीं तोड़ पाई?

दरअसल, पश्चिम बंगाल के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक बने ज्यादातर मुख्यमंत्री ब्राह्मण या कायस्थ समाज से रहे हैं। कांग्रेस, वामपंथ और तृणमूल — सभी दौर में सत्ता के शीर्ष पर सामाजिक विविधता सीमित ही दिखाई दी। अब भाजपा, जो खुद को सामाजिक न्याय और व्यापक प्रतिनिधित्व की राजनीति करने वाली पार्टी बताती है, उसके शासन में भी मुख्यमंत्री पद के लिए सामान्य वर्गीय चेहरे का आगे आना बहस का विषय बन गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में जाति की राजनीति उत्तर भारत की तरह खुलकर नहीं होती, लेकिन इसका असर सत्ता और संस्थाओं में साफ दिखाई देता है। चुनावों में भाजपा ने मतुआ, आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों के बीच बड़े पैमाने पर समर्थन हासिल करने का दावा किया था। ऐसे में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी ओबीसी, दलित या आदिवासी चेहरे को आगे न बढ़ाए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

हालांकि भाजपा समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री चुनने का आधार जाति नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता और जनाधार होना चाहिए। उनके मुताबिक शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम आंदोलन से लेकर भाजपा को बंगाल में मजबूत करने तक अहम भूमिका निभाई है, इसलिए उनका नाम सबसे आगे होना स्वाभाविक है।

लेकिन विपक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लोग इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका कहना है कि दशकों बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था, इसलिए लोगों को सामाजिक प्रतिनिधित्व में भी बदलाव की उम्मीद थी। अब कई लोग कह रहे हैं कि “चेहरे बदले, झंडे बदले, लेकिन सत्ता का सामाजिक चेहरा अब भी वही है।”

पश्चिम बंगाल की राजनीति अब सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता संरचना पर भी बड़ी बहस बनती जा रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गहराने की संभावना जताई जा रही है।