Saraikela : कल भाजपा ने राज्यभर के नगर निकायों पर धरना प्रदर्शन किया था. जिस पर भाजपा के ही पदाधिकारी सवाल खड़े कर रहे हैं. जिला कार्यसमिति सदस्य अनीशा सिन्हा ने अपने फेसबुक अकाउंट पर भावना व्यक्त करते हुए सांगठनिक प्रक्रिया पर करारा प्रहार किया है. आइए जानते हैं उनके विचार उन्हीं के कलम से — जैसा कि उन्होंने लिखा है …


” आज मैं धरना-प्रदर्शन में नहीं जा रही हूँ. भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष का कॉल आया था —निमंत्रण.. धरना प्रदर्शन कार्यक्रम में आने के लिए…लेकिन पहला कारण बहुत साधारण और ज़मीनी है. —मेरे घर में सिविल का काम चल रहा है..सुबह मिस्त्री आते हैं, शाम को वापस जाते हैं..और दूसरा कारण…क्या सच में बताने की ज़रूरत है…!!
जिस संगठन में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल “भीड़ प्रबंधन” तक सीमित कर दी जाए,
वहाँ कई बार उपस्थित न होना ही सबसे सशक्त और शालीन विरोध बन जाता है..झारखंड में संगठन मंत्री की “रणनीतिक प्रतिभा” अब इतनी पारदर्शी हो चुकी है कि आईना भी शर्म से धुंधला पड़ जाए..नगर निकाय चुनाव को दलगत आधार पर कराने की हड़बड़ी दरअसल यह स्वीकारोक्ति है कि पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं रहा..न पूर्व मुख्यमंत्रियों से कोई ठोस हस्तक्षेप, न ज़मीनी और प्रभावशाली नेताओं से कोई समन्वय, और न ही चुनावी तैयारी का कोई विश्वसनीय खाका.. बस फैसले ऊपर से थोपे गए — और उम्मीद की गई कि नीचे सब ताली बजाएँ..
मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर जो खबरें बाहर आईं, उन्होंने वर्षों से पसीना बहा रहे मूल भाजपा कार्यकर्ताओं के सब्र की आख़िरी डोर भी काट दी..प्रक्रिया पर सवाल हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं..इधर हेमंत सोरेन हर मौके पर राजनीतिक बढ़त बनाते जा रहे हैं..और उधर संगठन मंत्री चुनावी तैयारी को ऐसे अनदेखा कर रहे हैं जैसे ज़मीन की राजनीति कोई वैकल्पिक विषय हो..
सूत्रों की मानें तो विधानसभा-वार “खास लॉबी” खड़ी करने, अंदरूनी डीलिंग और सेटिंग की चर्चा आम है..
लेकिन संगठन में बोलने की हिम्मत अब सिर्फ़ व्हाट्सऐप फॉरवर्ड तक सीमित रह गई है..आज धरना-प्रदर्शन का आख़िरी दिन है..
मीडिया में यह खबर बन जाएगी, लेकिन ज़मीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल में यह एक और कील ठोक देगा..
वार्ड स्तर के कार्यकर्ता समर्थन तो देंगे, लेकिन पैसे और जोड़-तोड़ की राजनीति से दूरी बनाकर..क्योंकि इतिहास गवाह है —पैसा देने वाला कार्यकर्ता मज़बूत नहीं होता,
मज़बूत कार्यकर्ता पैसा नहीं मांगता..अभी भी समय है..
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को विराम देकर झारखंड के निष्ठावान, संघर्षशील और ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को साथ लिया जाए..जिन लोगों ने भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी, उन्हें नज़रअंदाज़ करना..भविष्य की सबसे बड़ी संगठनात्मक भूल साबित
होगी..अगर नगर निकाय चुनाव से पहले आत्ममंथन नहीं हुआ, तो यह धरना कोई संघर्ष नहीं, बल्कि भाजपा की संगठनात्मक कमजोरी का
अंतिम सार्वजनिक संकेत माना जाएगा..”

