सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला के शांत एवं पावन परिसर में विद्या, बुद्धि, विवेक एवं कला की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा पूरे विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार एवं गहन श्रद्धा भाव के साथ भव्य रूप से संपन्न हुई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक गरिमा एवं शैक्षणिक उल्लास से अनुप्राणित रहा।


इस पावन आयोजन में पूजा-अर्चना का नेतृत्व राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ० शिवचन्द झा ने किया। पूजा के उपरांत अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ० झा ने कहा कि “माँ सरस्वती केवल विद्या की प्रतीक नहीं, बल्कि विवेक, संस्कार और सृजनशील चेतना की अधिष्ठात्री हैं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है। सरस्वती पूजा हमें निरंतर अध्ययन, आत्मानुशासन और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराती है।”
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलसचिव श्रीमती डॉ० नीत नयना ने अपने संबोधन में कहा कि “शैक्षणिक संस्थानों में सरस्वती पूजा का आयोजन हमारी सांस्कृतिक जड़ों को सुदृढ़ करता है। यह पर्व विद्यार्थियों में ज्ञानार्जन के प्रति समर्पण, सकारात्मक दृष्टिकोण तथा शैक्षणिक अनुशासन को प्रोत्साहित करता है। सोना देवी विश्वविद्यालय शिक्षा और संस्कृति के समन्वय के माध्यम से समग्र विकास के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है।”
वहीं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति आदरणीय श्री प्रभाकर सिंह ने अपने संदेश में कहा कि “ज्ञान ही किसी भी समाज और राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है। माँ सरस्वती की आराधना हमें न केवल बौद्धिक प्रगति की दिशा दिखाती है, बल्कि नैतिक मूल्यों, विवेकपूर्ण आचरण और सामाजिक दायित्व की भावना को भी सुदृढ़ करती है। सोना देवी विश्वविद्यालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ संस्कारयुक्त समाज निर्माण की दिशा में सतत अग्रसर है।”
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सभी संकाय अध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। सभी ने सामूहिक रूप से माँ सरस्वती की उपासना कर विश्वविद्यालय की उत्तरोत्तर प्रगति, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना की।
पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन, सौहार्द एवं सांस्कृतिक मर्यादा का विशेष ध्यान रखा गया। पूजा उपरांत प्रसाद वितरण किया गया, जिससे विश्वविद्यालय परिवार में आपसी सद्भाव, एकता एवं समरसता का भाव और अधिक प्रबल हुआ।
सरस्वती पूजा का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि यह विश्वविद्यालय में ज्ञान, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संवर्धन का सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ।

