आदिवासी संस्कृति: जहां मौत के बाद भी पूर्वज रहते हैं घर के साथ, रोज़ मिलता है उन्हें भोजन

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न्यूज़ भारत 20 डेस्क :- आदिवासी वो लोग हैं जो किसी क्षेत्र के सबसे पहले बसने वाले और उसके असली निवासी माने जाते हैं. भारतीय संविधान ने उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान को बचाए रखने के लिए खास प्रावधान किए हैं. आदिवासी समाज भी चाहता है कि उसे अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ जीने दिया जाए. भारत में कुल 705 जनजातियां (2011 की जनगणना के मुताबिक) रहती हैं, जिनके रिवाज बेहद अनोखे हैं.

पूर्वजों के प्रति आदिवासियों का लगाव इतना गहरा है कि मृत्यु के बाद भी वे उन्हें अपने घर से अलग नहीं करते. उनके लिए घर में एक जगह तय होती है, जहां उन्हें मान-सम्मान से रखा जाता है और रोज़ या खास मौकों पर उनके लिए भोजन परोसा जाता है. मान्यता है कि पूर्वजों को भोजन अर्पित करने से घर में खुशहाली आती है और संकट दूर होते हैं.

झारखंड की कई जनजातियों में ये परंपरा है कि जब वे भोजन के लिए बैठते हैं, तो थाली से कुछ दाने निकालकर पूर्वजों को अर्पित करते हैं. उनका विश्वास है कि पूर्वज हर पल उनके साथ रहते हैं और उनकी कृपा से ही खेत-खलिहान और जंगल सुरक्षित हैं. मुंडा समाज के बुद्धिजीवी वाल्टर कंडुलना कहते हैं, “हमारे यहां हर भोजन में से कुछ हिस्सा पूर्वजों के लिए निकालना एक आभार प्रकट करने की रस्म है. विशेष अवसरों पर तो यह होता ही है, लेकिन रोज़ भी निभाया जाता है.” बदलते वक्त में भले ही ये परंपरा कुछ कमजोर हुई हो, पर सम्मान में कोई कमी नहीं आई है.

मौत के बाद भी लौट आती है आत्मा
आदिवासी समाज स्वर्ग-नर्क की धारणा पर विश्वास नहीं करता. उनका मानना है कि मौत के बाद भी आत्मा अपने परिजनों के बीच रहती है. इसी सोच के तहत “छाया बुलाने” की रस्म होती है. इसमें विधि-विधान से मृतक की आत्मा को वापस घर बुलाया जाता है. सुखराम पाहन बताते हैं, “हमारे इलाके में यह रस्म उसी दिन होती है जिस दिन मौत हुई हो. शवयात्रा के दौरान जहां शव पहली बार रखा जाता है, वहीं केंदू की डालियों और पुआल से एक छोटा घर बनाया जाता है, घड़ा रखा जाता है और आग जलाकर आत्मा को बुलाया जाता है. फिर ‘कोंडा’ यानी पूर्वज स्थल पर बाकी विधियां पूरी कर आत्मा को घर लाया जाता है.”

हर आदिवासी घर में पूर्वजों के लिए एक खास स्थान होता है — ‘अदिंङ’ या ‘कोंडा’. यहीं रोज़ पूजा और अर्पण होता है. प्रतिदिन के भोजन से चावल, हंडिया, मुर्गे का मांस, पानी और जो भी सामग्री घर में हो, वह पूर्वजों के नाम अर्पित की जाती है. खास मौकों पर स्वादिष्ट पकवान बनाकर परोसे जाते हैं, और भोजन देने के बाद उनका आभार जताना इस परंपरा का सबसे अहम हिस्सा है.

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