सरायकेला-खरसावां न्यूज: सरायकेला-खरसावां जिले में कृषि क्षेत्र से बदलाव और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। कभी बंजर और अनुपजाऊ मानी जाने वाली जमीनें आज हरियाली से लहलहा रही हैं। नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा संचालित वाड़ी परियोजना ने आदिवासी किसानों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है। इस पहल ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है।


रंगामाटिया गांव के किसान सोनाराम सोरेन इस परिवर्तन की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरे हैं। करीब पांच वर्ष पहले तक उनकी एक एकड़ जमीन बंजर थी और परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। बच्चों की पढ़ाई भी मुश्किल से हो पा रही थी। लेकिन वाड़ी परियोजना से जुड़ने के बाद उनकी खेती को नई दिशा मिली और आज वे आर्थिक रूप से सशक्त किसान बन चुके हैं। बढ़ी हुई आय के बल पर उन्होंने अपनी बेटी का नामांकन चाईबासा के एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में कराया है।
परियोजना के तहत सोनाराम सहित 16 परिवारों को जोड़कर 16 एकड़ क्षेत्र में सामूहिक खेती की शुरुआत की गई। किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर बागवानी अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। खेतों में आम्रपाली और मल्लिका किस्म के आम तथा एल-49 किस्म के अमरूद के पौधे लगाए गए। इससे किसानों को दीर्घकालिक आय का मजबूत आधार मिला।
फलदार पौधों के बीच खाली स्थानों पर सब्जियों की खेती कर किसानों ने मिश्रित खेती का मॉडल अपनाया। इससे उन्हें नियमित आय का स्रोत मिला और पौधों के विकसित होने तक भी आर्थिक लाभ प्राप्त होता रहा। इस मॉडल ने खेती के जोखिम को कम करने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाया है।
वाड़ी परियोजना का लाभ अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। जिले के 36 गांवों के 388 परिवार लगभग 379 एकड़ भूमि पर इस योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। खेतों में 25 हजार से अधिक आम और 10 हजार अमरूद के पौधे लगाए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में आम का उत्पादन बढ़कर लगभग पांच लाख किलोग्राम तक पहुंच गया है, जिससे किसानों की आय में लगातार वृद्धि हो रही है।
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए 250 किसानों को जोड़कर उअल-बाहा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी का गठन किया गया है। गांव में आधुनिक पैक हाउस स्थापित किया गया है, जहां फसलों की ग्रेडिंग और पैकेजिंग की जाती है। इसके बाद उत्पादों को सीधे जमशेदपुर, सिनी और गम्हरिया की मंडियों में भेजा जाता है। इस व्यवस्था ने बिचौलियों की भूमिका कम कर किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

