डुमरिया: प्रखंड में मलेरिया से दो बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग मौत होने के बाद ही सक्रिय होता है। रविवार को गोजातोल, बाकड़ा, लांगों, बुरुडीह, रायसेनबेड़ा और माड़ोतोलिया गांवों में मलेरिया जांच शिविर लगाए गए, जहां 470 लोगों की जांच की गई। इससे पहले शनिवार को छह मरीज मलेरिया पॉजिटिव पाए गए थे। वहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की ओपीडी में भी लगातार मरीज पहुंच रहे हैं।


प्रखंड के बाकड़ाकोचा गांव निवासी 13 वर्षीय शेखर टुडू की 21 अक्टूबर को डुमरिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से रेफर किए जाने के दौरान मौत हो गई थी। वहीं, 23 अक्टूबर को झांयाडीह गांव निवासी 11 वर्षीय प्रदीप मुर्मू की जमशेदपुर में इलाज के दौरान मौत हो गई। दोनों बच्चों की मौत मलेरिया से होने की बात सामने आई है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रखंड के कई गांव पहले से मलेरिया प्रभावित क्षेत्र के रूप में चिह्नित हैं, लेकिन वहां नियमित जांच और मेडिकल कैंप नहीं लगाए जाते। भीतरआमदा, बाकड़ाकोचा, माड़ोतोलिया, केंदुआ, पलाशबनी, डिबूडीह, लखाइडीह, रुपुकोचा, बहादा और चटानीपानी समेत कई गांवों में नियमित जांच नहीं होने का आरोप लगाया गया है।
ग्रामीणों के मुताबिक, मलेरिया नियंत्रण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्वास्थ्य सहिया के भरोसे है। उनका आरोप है कि कई मल्टी-पर्पज वर्कर (एमपीडब्ल्यू) नियमित रूप से अपने क्षेत्रों में जांच के लिए नहीं पहुंचते, हालांकि कुछ स्वास्थ्यकर्मी सक्रिय हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मौत के बाद शिविर लगाए जाते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाती है।
ग्रामीणों ने प्रभावित गांवों में नियमित मेडिकल कैंप लगाने, मलेरिया की जांच बढ़ाने और स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की मांग की है।

