झारखंड की राजनीति में उभरता नया चेहरा: दुखनी सोरेन ने उठाए आदिवासी अधिकारों और सबर जनजाति के गंभीर मुद्दे

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झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक नया और गंभीर चेहरा तेजी से चर्चा में उभर रहा है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की पुत्री दुखनी सोरेन अब सामाजिक सरोकारों, आदिवासी अधिकारों और जनजातीय समस्याओं को लेकर जिस सक्रियता के साथ सामने आ रही हैं, उसने राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही क्षेत्रों में नई चर्चा को जन्म दिया है। राजभवन में झारखंड के महामहिम राज्यपाल संतोष गंगवार से उनकी हालिया मुलाकात को केवल शिष्टाचार भेंट नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आदिवासी समाज की ज्वलंत समस्याओं को गंभीरता से उठाने की एक मजबूत पहल के रूप में देखा जा रहा है। दुखनी सोरेन ने राज्यपाल से मुलाकात के दौरान विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही सबर जनजाति की बदहाल स्थिति, उनकी घटती आबादी और योजनाओं के लाभ से उन्हें वंचित किए जाने जैसे गंभीर मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।इस मुलाकात में उन्होंने जादूगोड़ा, पोटका, घाटशिला और बहरागोड़ा क्षेत्र में निवास कर रही सबर जनजाति की दयनीय स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया कि इस जनजाति की लगातार घटती आबादी और सामाजिक उपेक्षा पर तत्काल संज्ञान लिया जाए। दुखनी सोरेन ने राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन में झारखंड में जल, जंगल और जमीन की रक्षा, स्थानीय नीति को सख्ती से लागू करने, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में ठोस पहल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास कार्यों, टेंडर और रोजगार में स्थानीय आदिवासी-मूलवासी युवाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। साथ ही ग्राम सभा और ग्राम प्रधानों को संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप अधिक शक्तियां देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।उन्होंने कोल्हान समेत ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने, आदिवासी संस्कृति, भाषा और परंपराओं के संरक्षण के लिए विशेष नीति बनाने तथा विस्थापन, बेरोजगारी और खनन प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं पर विशेष ध्यान देने की मांग भी रखी। इसके अलावा पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून को प्रभावी रूप से लागू करने का आग्रह भी राज्यपाल से किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो झारखंड की राजनीति लंबे समय से ऐसे नेतृत्व की तलाश में रही है जो केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहकर जमीनी मुद्दों को गंभीरता से उठाए। ऐसे समय में दुखनी सोरेन की सक्रियता युवाओं, महिलाओं और आदिवासी समाज के बीच सकारात्मक संदेश दे रही है। उनका शांत लेकिन संवेदनशील राजनीतिक अंदाज उन्हें पारंपरिक राजनीति से अलग पहचान दिला रहा है।