रांची/गुमला: गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई 6 वर्षीय बच्ची के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। बच्ची की मां चंद्रमुनी उरांव द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी को तलब किया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Sujit Narayan Prasad और Sanjay Prasad की खंडपीठ ने की।


सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2018 से 2020 तक गुमला में पदस्थापित पुलिस अधीक्षकों (एसपी) की जांच को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि जब पहले ही एसपी की कार्यशैली और जांच प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हुए जांच का आदेश दिया जा चुका था, तो उस आदेश को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी क्यों दायर की गई।
इस पर मुख्य सचिव ने अदालत के समक्ष खेद व्यक्त करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री Hemant Soren के निर्देश के बाद सर्वोच्च न्यायालय में दायर एसएलपी वापस ले ली गई है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अधिकारियों को संवेदनशीलता के साथ कार्य करने की नसीहत दी। अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति न्याय की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचता है तो उसे न्याय मिलना सुनिश्चित करना प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी है। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने कहा कि मुख्यमंत्री पूरे राज्य के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होते हैं और हर मामले की व्यक्तिगत निगरानी संभव नहीं है, इसलिए अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों का गंभीरता से निर्वहन करना चाहिए।
अदालत ने अधिकारियों की उस दलील पर भी नाराजगी जताई, जिसमें कहा गया था कि ऐसी जांच से अधिकारियों में हतोत्साह की भावना पैदा होती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ काम करना है। जिम्मेदारियों के निर्वहन में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हाईकोर्ट ने अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए वर्ष 2018 से 2020 तक गुमला में पदस्थापित सभी एसपी की कार्यशैली की जांच जारी रखने का निर्देश दिया है। छह वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद बच्ची की तलाश और मामले की जांच में हुई कथित लापरवाही अब न्यायिक जांच के दायरे में रहेगी।

