जमशेदपुर: जब हाथ बोलते हैं तो समावेशन सुनता है, भारतीय सांकेतिक भाषा को बढ़ावा दे रहा सबल

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जमशेदपुर: भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि सीखने, भावनाएं व्यक्त करने, रिश्ते बनाने और अपनी पहचान को समझने का जरिया भी है। बधिर समुदाय के लिए भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) भी एक स्वतंत्र और पूर्ण भाषा है, जिसकी अपनी संरचना और नियम हैं। हाथों के संकेतों और दृश्य माध्यमों के जरिए इसमें विचारों और भावनाओं को व्यक्त किया जाता है।

भारत में ISL को संस्थागत रूप देने की दिशा में भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (ISLRTC) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। केंद्र की स्थापना को 2011 में मंजूरी मिली और सितंबर 2015 में इसे दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के तहत स्वायत्त संगठन के रूप में स्थापित किया गया। ISLRTC भारतीय सांकेतिक भाषा के विकास, शोध, प्रशिक्षण और अध्ययन सामग्री तैयार करने की दिशा में काम करता है।

टाटा स्टील फाउंडेशन का दिव्यांगजन समावेशन कार्यक्रम ‘सबल’ भी ISL के प्रति जागरूकता बढ़ाने और बधिर समुदाय की सहभागिता मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। स्कूलों, कॉलेजों, कंपनियों और परिवारों में जागरूकता सत्रों के जरिए लोगों को बधिर समुदाय की संस्कृति और संवाद के तरीकों को समझने का अवसर दिया जाता है। सबल बुनियादी ISL प्रशिक्षण के साथ कौशल विकास, शिक्षा, खेल और सामुदायिक सहभागिता से जुड़े अवसर भी उपलब्ध कराता है।

जमशेदपुर के कार्मेल बाल विहार में नोआमुंडी के बधिर समुदाय के 12 विद्यार्थी कक्षा VIII से XII तक आवासीय शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। वहीं जोडा, नोआमुंडी और दानागाड़ी में आयोजित ISL जागरूकता सत्रों के जरिए इस पहल को ग्रामीण समुदायों तक भी पहुंचाया जा रहा है।

हर वर्ष 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 2017 में इसकी घोषणा की थी। वर्ष 2026 में 21 से 27 सितंबर तक अंतरराष्ट्रीय बधिर सप्ताह का आयोजन “बधिरजनों के मानवाधिकारों की घोषणा” विषय पर केंद्रित है।

सबल की ओर से इस अवसर पर एक महीने तक भारतीय सांकेतिक भाषा पर केंद्रित गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य केवल संकेत सिखाना नहीं, बल्कि स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदायों में संवाद को अधिक सुलभ और समावेशी बनाना है।

टाटा स्टील फाउंडेशन का ‘सबल’ कार्यक्रम वर्ष 2017 में नोआमुंडी से शुरू हुआ था। आज यह झारखंड और ओडिशा के कई प्रखंडों में शिक्षा, कौशल विकास, रोजगारपरकता, खेल, अधिकारों और सामुदायिक सहभागिता के क्षेत्र में काम कर रहा है। इसका मूल संदेश है कि दिव्यांगता के बजाय संभावनाओं पर ध्यान दिया जाए और समावेशन को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया जाए।