जामडीह में ‘विकास’ सिर्फ कागज पर: प्यास, अंधेरा और खाट पर टूटती सांसें

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जामडीह गांव, जो महुआडांड़ प्रखंड के अंतर्गत आता है, आजादी के 78 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। आदिवासी बहुल इस गांव में सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित नजर आती हैं, जबकि जमीनी हकीकत प्यास, अंधेरे और लाचारी की कहानी बयां करती है। जल जीवन मिशन के तहत गांव को नल-जल योजना से आच्छादित बताया गया है, लेकिन जल मीनार वर्षों से बंद पड़ी है, मोटर खराब है और पाइपलाइन बेकार हो चुकी है। मजबूरी में महिलाएं रोज 3 किलोमीटर दूर नाले से गंदा पानी लाने को विवश हैं, जिससे गांव में उल्टी-दस्त और बुखार जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। सड़क की हालत और भी बदतर है—आज तक पक्की सड़क नहीं बनने के कारण बीमारों को 15 से 25 किलोमीटर तक खाट पर ढोकर ले जाना पड़ता है, और कई बार रास्ते में ही उनकी मौत हो जाती है। गांव का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी सिर्फ नाम का रह गया है, जहां न डॉक्टर हैं, न दवा, और भवन मवेशियों का अड्डा बन चुका है। हाल ही में एक बीमार बच्चे के इलाज के लिए परिजनों को छत्तीसगढ़ से निजी डॉक्टर बुलाना पड़ा। बिजली की स्थिति भी चिंताजनक है—झारखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (JREDA) द्वारा लगाया गया सोलर सिस्टम महज कुछ महीनों में फेल हो गया, जिससे गांव आज भी अंधेरे में डूबा हुआ है और लोग दीये-ढिबरी के सहारे जीवन गुजार रहे हैं। ग्रामीणों ने सांसद कालीचरण सिंह, विधायक रामचंद्र सिंह और उपायुक्त संदीप कुमार से अपील की है कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई की जाए, ताकि पानी, सड़क, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं गांव तक पहुंच सकें।