नेतरहाट की चमक के पीछे कड़वी हकीकत, पहाड़ और भूख से लड़कर पढ़ने को मजबूर बच्चे

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महुआडांड़/नेतरहाट: देशभर में अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वादियों के लिए प्रसिद्ध नेतरहाट की खूबसूरत तस्वीरों के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जो दिल को झकझोर देती है। पर्यटन की चमक-दमक से कुछ ही दूरी पर बसे आधे और कोरगी गांव के बच्चे आज भी अभाव, भूख और कठिन पहाड़ी रास्तों से जूझते हुए शिक्षा हासिल करने को मजबूर हैं।

यहां हर सुबह संघर्ष की नई कहानी लेकर आती है। सूरज की पहली किरण के साथ ही छोटे-छोटे बच्चे फटी कॉपियां, पुराने बैग और अधूरे सपनों को साथ लेकर स्कूल के लिए निकल पड़ते हैं। कई बच्चों के पैरों में चप्पल तक नहीं होती और कई बिना भोजन किए ही कई किलोमीटर दूर स्थित स्कूल की ओर चल पड़ते हैं।

गांव में स्कूल नहीं होने के कारण बच्चों को रोज दुरूप गांव तक पहुंचने के लिए खतरनाक पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है। पथरीले रास्ते, फिसलन भरी पगडंडियां और बरसात के दिनों में उफनते नाले इस सफर को और भी मुश्किल बना देते हैं। कई बार बच्चे रास्ते में गिरकर चोटिल हो जाते हैं, तो कई बार डर के कारण अभिभावक उन्हें घर पर ही रोक लेते हैं, जिससे पढ़ाई बाधित होती है।

इन गांवों में गरीबी इतनी गहरी है कि कई परिवार अपने बच्चों को सुबह भरपेट भोजन भी नहीं दे पाते। ऐसे में मिड-डे मील ही बच्चों के लिए पोषण का मुख्य सहारा बन जाता है। लेकिन बारिश या अन्य कारणों से स्कूल नहीं पहुंच पाने पर बच्चे शिक्षा और भोजन दोनों से वंचित रह जाते हैं।

विडंबना यह है कि पर्यटन के लिए मशहूर इस क्षेत्र के आसपास बसे ये गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। शाम होते ही गांव अंधेरे में डूब जाता है। बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चे ढिबरी और लकड़ी की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कई जगहों पर मोबाइल नेटवर्क तक नहीं है, जिससे डिजिटल शिक्षा भी दूर की बात बन जाती है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से योजनाओं और सर्वे की बातें होती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सुविधा और स्थानीय विद्यालय जैसी बुनियादी जरूरतें अब भी अधूरी हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि जल्द से जल्द गांव में स्कूल और सड़क की व्यवस्था की जाए, ताकि बच्चों को इतनी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

कठिन हालात के बावजूद इन बच्चों की आंखों में सपने अब भी जिंदा हैं। दिनभर की थकान के बाद भी उनके चेहरों पर उम्मीद दिखाई देती है। उनका सपना है पढ़-लिखकर अपने गांव और परिवार की स्थिति को बदलना।

नेतरहाट की वादियों में गूंजती यह उम्मीद सिर्फ कुछ बच्चों की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों मासूमों की हकीकत है, जो बेहतर भविष्य के लिए हर दिन संघर्ष कर रहे हैं।