रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने जेलों में संविदा और दैनिक वेतन पर लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने 23 सितंबर 2026 को W.P.(S) की कई याचिकाओं पर साझा फैसला सुनाते हुए 23 नवंबर 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत जेलों में कर्मचारियों की सेवाएं आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से लेने का निर्णय किया गया था।


अदालत ने कहा कि कई याचिकाकर्ता 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे हैं। W.P.(S) No. 878 of 2022 के याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत गुइन की नियुक्ति 19 जून 2013 को तेनुघाट उपजेल में चालक के पद पर दैनिक वेतनकर्मी के रूप में हुई थी। रिकॉर्ड के अनुसार यह स्वीकृत पद था।
फैसले में अदालत ने 3 मार्च 2021 के राज्य सरकार के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया, जिसके तहत हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों के आधार पर मुख्य रूप से चतुर्थ श्रेणी के पदों पर कार्यरत 183 कर्मचारियों की सेवाएं नियमित की गई थीं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता भी लंबे समय से स्वीकृत पदों पर कार्यरत हैं और समान परिस्थितियों में समान व्यवहार के हकदार हैं।
अदालत ने 19 दिसंबर 2022 की फाइल नोटिंग का हवाला देते हुए कहा कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक विभाग की कोई स्पष्ट नीति नहीं थी। जेलों को संवेदनशील संस्थान बताते हुए कोर्ट ने स्वीकृत पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्ति को मनमाना और अवैध माना। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड सरकार मामले के निर्णय का भी उल्लेख किया गया।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले की तरह संविदा या दैनिक वेतन पर काम जारी रखने और उसी आधार पर वेतन पाने का अधिकार दिया। साथ ही राज्य सरकार को 183 नियमित कर्मचारियों के समान स्थिति को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ताओं के नियमितीकरण की प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्वीकृत पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिए नियुक्ति पर भी रोक लगाई और 22 सितंबर 2022 के अंतरिम आदेश को अंतिम रूप से लागू कर दिया।

