सहरसा: नगर निगम में विकास योजनाओं, मुख्य बस पड़ाव की बंदोबस्ती, पार्कों एवं पोखरों के निर्माण तथा विभिन्न चौक-चौराहों पर वाहन पड़ाव के नाम पर वसूली से जुड़े मामलों की जांच रिपोर्ट नगर विकास एवं आवास विभाग को सौंप दी गई है। पांच सदस्यीय मुख्यालय जांच समिति ने नगर आयुक्त और अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, विधिसम्मत कानूनी कार्रवाई तथा अनियमित रूप से खर्च की गई अतिरिक्त राशि की वसूली की अनुशंसा की है।


विभागीय दस्तावेज के अनुसार, 21 सितंबर 2026 को नौ पृष्ठों की मुख्य रिपोर्ट और 65 पृष्ठों के अनुलग्नक समेत कुल 74 पृष्ठों की रिपोर्ट सौंपी गई। पूर्व मंत्री डॉ. आलोक रंजन द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद गठित समिति ने 20 से 22 अगस्त तक नगर निगम के अभिलेखों की जांच और स्थलीय निरीक्षण किया था। जांच दल के अध्यक्ष संयुक्त सचिव संजय कुमार थे। अधीक्षण अभियंता हरेंद्र कुमार उपाध्याय, उप सचिव परमानंद पाण्डेय और सहायक अभियंता सौरभ कुमार सदस्य, जबकि आंतरिक वित्तीय सलाहकार सुभाष कुमार सहयोगकर्ता के रूप में शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, नगर आयुक्त ने 21 जून 2025 को पदस्थापन ग्रहण किया और जुलाई 2025 से फरवरी 2026 तक करीब आठ महीनों में 421 विभागीय कार्य कराए गए। रिपोर्ट में बड़ी संख्या में कार्य पांच व्यक्तियों के माध्यम से कराए जाने का उल्लेख है। टैक्स दरोगा रंजन कुमार रजक और सिटी मैनेजर अभिसार कश्यप के माध्यम से करीब 150 से 200 योजनाएं प्रत्येक, नाजिर संतोष कुमार के माध्यम से 50 से 60, संविदा पर कार्यरत कनीय अभियंता दिलीप कुमार के माध्यम से करीब 50 और कनीय अभियंता अजय कुमार रमण के माध्यम से करीब 15 योजनाएं कराए जाने की बात कही गई है। समिति ने कार्यों के इस तरह सीमित व्यक्तियों के बीच केंद्रित होने को गंभीर माना है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिटी मैनेजर अभिसार कश्यप के संविदा विस्तार से संबंधित जानकारी 30 अक्टूबर 2025 के बाद उपलब्ध नहीं है, इसके बावजूद उन्हें बड़ी संख्या में योजनाओं का अभिकर्ता बनाकर राशि उपलब्ध कराई गई। समिति ने इस प्रक्रिया को भी जांच के दायरे में रखा है।
मुख्य बस पड़ाव की बंदोबस्ती की जांच में निविदा की कंडिका 5, 7, 12 और 13 के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है। उप विकास आयुक्त के जांच प्रतिवेदन के आधार पर समिति ने कहा कि निविदा शर्तों के विपरीत शहर के दस अन्य स्थानों पर भी वाहनों से वसूली की जा रही थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 11 फरवरी 2026 को प्रधान सचिव द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश के बावजूद संबंधित व्यक्ति पर प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई, जबकि दूसरे व्यक्तियों पर प्राथमिकी दर्ज कराने और विभाग को भ्रामक सूचना देने का मामला सामने आया। समिति ने इन मामलों में भी नियमानुसार कार्रवाई की अनुशंसा की है।

